Thursday, July 19, 2012

मधुश्रावणी

मधुश्रावणी 

एखन मधुश्रावणी पाबनि अपन चरम पर पहुँच  रहल अछि. एहि पाबनि के मिथिला में बद्द महत्व छैक. प्रत्येक नव-विवाहिता अपन पहिलुक सावन में  इ पाबनि मनबैत छथिन्ह. इ पाबनि पूर्ण रूपें नारी प्रधान अछि.  पुरुख के हस्तक्षेप त ओरीयान करै में केवल होइत अछि. १३ दिन चलै बाला इ पाबनि पुरे मिथिला में मनोहारी दृश्य उत्पन्न करैत अछि, जाकर आनंद केवल कउनु सौभाग्यशाली ये टा उठाबैत अछि. रंग-बिरंग के नव वस्त्र धरणी केने, झुण्ड के झुण्ड बनने मिथिलानी सब समूह बना के फूल लोढे लेल जायत अछि. (ओना आब गामो घर में फूल के अभाव देखल जायत अछि, ते समूह में लोढ्नाय कने कम भेल अछि ).  शहर में फूल लोढे के प्रथा लगभग नहिये अछि. मुदा परंपरा के लेल कराय पारित अछि. एहि पाबनि में अरबा-अनुन खायत छथिन्ह मिथिलानी आ अंतिम दिन टेमी दागल जायत अछि. मिथिलानी के सासुर से धरों भार-दौर आबैत अछि. (वर पक्ष से सबसे बेसी भार मधुश्रवानिये में आबैत अछि.). तेरहो दिन नव-नव मनोरंजक एवं उपयोगी कथा" कथकाही" द्वारा कहल जायत अछि. सासुर पक्ष के भार से स्त्रीगन लोकनि के विशेष भोज होइत अछि. मधुश्रावणी कें आधुनिक हनीमून के  पौराणिक रूप मानल जायत अछि. ओनाहु, श्रावण मास के श्रृंगार के मास मानल जायत अछि, तें आरो समीचीन.

सब मिथिलावासी के मधुश्रावणी के ढेरों बधाई.

एहि अवसर पर प्रेमी जी के एक गीत याद  आबि  गेल, दू पांति ऐना अछि:   चलु चलु बहिना हकार पूरे ले, चुनी दाय के वर एलय टेमी दागय ले . एहि गीत में प्रेमी जी मधुश्रावणी पाबनि के बड्ड नीक वर्णन केने छथि. 

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