Wednesday, March 7, 2012

फगुआ


गाम में छोडा सब एही बेर तैयार  छै.  एही बेर त धुडखेल मचाकय रहबै.  ओनाही फगुआ के किछु इंटेलेक्चुअल टाइप के लोक नहीं मनबैत अछि  किएक त एही से हुनका सब के देसिपना के दुर्गन्ध अबैत छन्हि. धूरा एवं रंग से बड्ड परहेज छन्हि  हुनका सब के. तैयो कउनु बात नहीं, हम सब त फगुआ खेलबे करब.  फगुआ टा नहीं, धुर्खेलो. इ पाबनिये एहन छै जे कतबो पढ़ुआ  हुए आ की गंवार, हाकिम-पर्फेसर हुआ की महीसवार अपना हिसाब से सब  एहि  पाबनि के खूब उत्साह आ उमंग से मनबैत अछि.  आर्थिक रूप से सेहो इ पाबनि ककरो अपमानित नहि करैत अछि.  सब एक्कहि रंगकुनु   दुराव नहि. इ पाबनिये एहन अछि जे एहि में कुनु देखाबा के गुन्जैशे नहि छै. आ तै कियो कुनु देखाबा करितो नहि छै. शायत ईअह कारन छियै जे इंटेलेक्चुअल लोक ओते उत्साह से नहि मनाबैत छै जतेक उत्साह आ उमंग से  सामान्य लोक. मुदा जखन इ तथाकथित इन्तेलेचुअल आ धनि मणि लोक सब फगुआ खेलैत छथि त एकदम सामान्य जन बनी जैत छथि जेना कोनो भेद भाव नहि हो. यैह त एहि पाबैन के खूबी छियै जे सब एके रंग रंगायल बुझाइत अछि. इ त बुझले अछि जे फगुआ उत्साह, उमंग, भंग, मालपुआ, पिरुकिया इत्यादी के पाबैन थिक. इ पाबैन त नवका वियाहल लोक सब त किछु बेसिए जोश से मनबैत छथि.अपनों गाम में धुरखेल आ फगुआ खूब जमैत अछि. कतौ-कतौ बुरबक लोक सब रंग के बदरंग करैत छथि अपन किरदानी से, मुदा फगुआ तैयौ खूब जमैत अछि.  जोगीरा आ फगुआ के गीत होरी फगुआ जमबई में कोनो कसर नहि छोरैत अछि. कतेक दिन भ गेल, गाम के फगुआ नहि देखलहु.  बुझु त इ दुर्भाग्य थिक की नहि?  फेर याद आबैत अछि.............. एक महिना पहिनहि  से लागैत रहैत छल जे फगुआ आबि गेल. आम में मोजर लागे के देरी की, फगुआ शुरू. कर-कुटुंब के रंग लगायब शुरू भ जायत छल सरस्वतिए पूजा  से. जे कुटुम गाम एलाह, बिना रंगायल नहि घुरलाह. याद आबि रहल अछि गाम के धुरखेल. बीसों बरिस भ गेल शायद, मुदा ओहिना बुझाइत अछि जे ठीक सोझा में भ रहल अछि. सब टोल के लोक ८-९ बजिते तैयारी के साथ घर से निकलि गेल धुरखेल के लेल.  धीया पूता सब त कने सबेरगरे से छौर, थाल, धूरा इत्यादी एक दोसर पर फेंकनाय  शुरू क देलक. फेर होरी आ जोगीरा के सरारा............. शुरू भ गेल. पुबारी टोल के धुरखेल मंडली ते फेमस अछि पुरे गाम में. ओ सब बड्ड आक्रामक शैली में धुरखेल खेलायत अछि.  बाप, पित्ति, भाय, भातिज इत्यादी सब मिल के एकटा गैंग बनेने छै. छौर, धूरा, थाल, गोबर, गूंह... कउनु चीज बागल नहि हुनका सबहक लेल. जे सामना में आयल, तकरे लेप देलहु, पालिश के देलहु तकर मिश्रण से.हलुक-फलुक लोक भेटल त ओकरा कचरा के खाधि में पटैक देलहु. डोका के माला पहिरि,टीन के ढोल बना के ल लेलहू आ घुमई छि  पूरा गाम. एहि धुरखेल के बहाना  से समूचा  गाम के सफाई भ जैत छल. अगिला दिन फेर रंग आ अबीर उरबे करतय. लेकिन धुरखेल में जे सामंजस्य लखा परेत अछि से फगुआ दिन नहि, इ हमरा बुझाइत अछि.

ओना अपनों गाम के फगुआ के रूप बदलि गेल अछि. भंग के जगह पर दारू के किछ बेसिए जोर भ गेल अछि. एहि से छुटकारा भेटबाक चाही. एहि में युवा वर्ग के योगदान आवश्यक अछि. गाम के मंतान्ग्बाक  के दृश्य त' अद्भुत होइत अछि. आशा अछि जे कलही अपना गाम में फगुआ नीक जकां मनायल जायत.  ओना किछु-किछु दुखद घटना के आलोक में पूरा जोश के उम्मीद करनाय बेमानी थिक, मुदा पाबनि मनायब सेहो अबश्यक अछि की नहि?  सब  गोटे  के फगुआ बहुत-बहुत बधाई.  

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